कविता- स्वदेशी अपनाओ… (Poetry- Swadeshi Apnao…) Hindi Kavita | Best Kavita | Hindi Poems

कविता- स्वदेश अपनाओ… (कविता- स्वदेशी अपनाओ…)

सुन-सुनो की एक कहानी
दुनिया की खोज करने वाले लोग
कुछ साल पहले की बात
दिवाली के कुछ दिन पहले
चकमक-दकमक बाज़ारों में
सूचना और चौबारों में
स्तम्भ को
ख़रीदने की होड़
चीन की समृद्धि सब
सौंदर्य में बेजोड़ खेल
सहसा
लिली छुई तो अंतर्लीन से
राय
भाई-भाई
जोढाया हम पे कहर
पीठ में भोंका छुरा
हम सिद्ध करें?
हम
और समृद्ध करें?
इस प्रकार
टैग:
पैर हंसता ही
‘एक हमारे-तुम्हारे न ख़रीदने से
कोई फर्क नहीं पड़ता
और सभी को
किसी के पास नहीं’
सबका मत भिन्न
मेरा मन ही खिन्न था
घर पर आवर पर
निरंतर
हम चौगुनी विविधताएं
हम जुआ खेल खेल
सहसा प्यारा सा विचार
मन पर इश्क शंका
ध्यान से देखा गया फीट
पूरी तरह से
इस संकल्प पर टिके हैं
सोशल मीडिया पर
निज
औरों के ऐसे संकल्प से
मन में नई घड़ी
आज खबर
‘कुछ नहीं होने वाला’
के पेसेदना है
‘कम से कम’
इंसान होने का मतलब है…

भाव प्रकाश

यह भी: शायरी

फोटो सौजन्य: फ्रीपिक



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